चमत्कारिक अष्ट यक्षिणियों की साधना, तुरंत मिलेगा फल
यक्ष का शाब्दिक अर्थ होता है 'जादू की शक्ति'।
आदिकाल में प्रमुख रूप से ये रहस्यमय जातियां
थीं:- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व,
अप्सराएं, पिशाच, किन्नर, वानर, रीझ, भल्ल,
किरात, नाग आदि। ये सभी मानवों से कुछ अलग
थे। इन सभी के पास रहस्यमय ताकत
होती थी और ये सभी
मानवों की किसी न किसी
रूप में मदद करते थे। देवताओं के बाद देवीय
शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है।
कहते हैं कि यक्षिणियां सकारात्मक शक्तियां हैं तो पिशाचिनियां
नकारात्मक। बहुत से लोग यक्षिणियों को भी
किसी भूत-प्रेतनी की तरह
मानते हैं, लेकिन यह सच नहीं है। रावण के सौतेला
भाई कुबेर एक यक्ष थे, जबकि रावण एक राक्षस। महर्षि
पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की दो पत्नियां
थीं- इलविला और कैकसी। इलविला से
कुबेर और कैकसी से रावण, विभीषण,
कुंभकर्ण का जन्म हुआ। इलविला यक्ष जाति से थीं
तो कैकसी राक्षस। जिस तरह प्रमुख 33 देवता होते
हैं, उसी तरह प्रमुख 8 यक्ष और यक्षिणियां
भी होते हैं। गंधर्व और यक्ष जातियां देवताओं
की ओर थीं तो राक्षस, दानव आदि जातियां
दैत्यों की ओर। यदि आप देवताओं की
साधना करने की तरह किसी यक्ष या
यक्षिणियों की साधना करते हैं तो यह भी
देवताओं की तरह प्रसन्न होकर आपको उचित
मार्गदर्शन या फल देते हैं। उत्लेखनीय है कि जब
पाण्डव दूसरे वनवास के समय वन-वन भटक रहे थे तब एक
यक्ष से उनकी भेंट हुई जिसने युधिष्ठिर से विख्यात
'यक्ष प्रश्न' किए थे। उपनिषद की एक कथा
अनुसार एक यक्ष ने ही अग्नि, इंद्र, वरुण और वायु
का घमंड चूर-चूर कर दिया था। यक्षिणी साधक के
समक्ष एक बहुत ही सौम्य और सुन्दर
स्त्री के रूप में प्रस्तुत होती है।
किसी योग्य गुरु या जानकार से पूछकर ही
यक्षिणी साधना करनी चाहिए। यहां
प्रस्तुत है यक्षिणियों की चमत्कारिक
जानकारी। यह जानकारी मात्र है साधक
अपने विवेक से काम लें। शास्त्रों में 'अष्ट यक्षिणी
साधना' के नाम से वर्णित यह साधना प्रमुख रूप से यक्ष
की श्रेष्ठ रमणियों की है।
ये प्रमुख यक्षिणियां है - 1. सुर सुन्दरी
यक्षिणी, 2. मनोहारिणी
यक्षिणी, 3. कनकावती
यक्षिणी, 4. कामेश्वरी
यक्षिणी, 5. रतिप्रिया यक्षिणी, 6.
पद्मिनी यक्षिणी, 7. नटी
यक्षिणी और 8. अनुरागिणी
यक्षिणी। प्रत्येक यक्षिणी साधक को
अलग-अलग प्रकार से सहयोगिनी होकर सहायता
करती है, अतः साधक को चाहिए कि वह आठों
यक्षिणियों को ही सिद्ध करने के लिए
किसी योग्य गुरु या जानकार से इसके बारे में जानें।
1. सुर सुन्दरी यक्षिणी : इस
यक्षिणी की विशेषता है कि साधक उन्हें
जिस रूप में पाना चाहता हैं, वह प्राप्त होती
ही है- चाहे वह मां का स्वरूप हो, चाहे वह बहन
या प्रेमिका का। जैसी रही भावना
जिसकी वैसे ही रूप में वह उपस्थित
होती है या स्वप्न में आकर बताती है।
यदि साधना नियमपूर्वक अच्छे उद्देश्य के लिए की
गई है तो वह दिखाई भी देती है। यह
यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक को ऐश्वर्य,
धन, संपत्ति आदि प्रदान करती है। देव
योनी के समान सुन्दर सुडौल होने से कारण इसे सुर
सुन्दरी यक्षिणी कहा गया है।
2. मनोहारिणी यक्षिणी :
मनोहारिणी यक्षिणी सिद्ध होने के बाद
यह यक्षिणी साधक के व्यक्तित्व को ऐसा सम्मोहक
बना देती है कि वह दुनिया को अपने सम्मोहन पाश में
बांधने की क्षमता हासिल कर लेता है। वह साधक को
धन आदि प्रदान कर उसे संतुष्ट करती है।
मनोहारिणी यक्षिणी का चेहरा अण्डाकार,
नेत्र हरिण के समान और रंग गौरा है। उनके शरीर से
निरंतर चंदन की सुगंध निकलती
रहती है।
3. कनकावती यक्षिणी :
कनकावती यक्षिणी को सिद्ध करने के
पश्चात साधक में तेजस्विता तथा प्रखरता आ जाती है,
फिर वह विरोधी को भी मोहित करने
की क्षमता प्राप्त कर लेता है। यह
यक्षिणी साधक की प्रत्येक मनोकामना
को पूर्ण करने मे सहायक होती है। माना जाता है कि
यह यक्षिणी यह लाल रंग के वस्त्र धारण करने
वाली षोडश वर्षीया, बाला स्वरूपा है।
4. कामेश्वरी यक्षिणी : यह साधक को
पौरुष प्रदान करती है तथा पत्नी सुख
की कामना करने पर पूर्ण पत्निवत रूप में उपस्थित
होकर साधक की इच्छापूर्ण करती है।
साधक को जब भी किसी चीज
की आवश्यकता होती है तो वह
तत्क्षण उपलब्ध कराने में सहायक होती है। यह
यक्षिणी सदैव चंचल रहने वाली
मानी गई है। इसकी यौवन युक्त देह
मादकता छलकती हुई बिम्बित होती है।
5. रति प्रिया यक्षिणी : इस यक्षि़णी को
प्रफुल्लता प्रदान करने वाली माना गया है। रति प्रिया
यक्षिणी साधक को हर क्षण प्रफुल्लित
रखती है तथा उसे दृढ़ता भी प्रदान
करती है। साधक-साधिका को यह कामदेव और रति के
समान सौन्दर्य की उपलब्धि कराती है।
इस यक्षिणी की देह स्वर्ण के समान
है जो सभी तरह के मंगल आभूषणों से सुसज्जित
है।
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6. पदमिनी यक्षिणी : पद्मिनी
यक्षिणी अपने साधक में आत्मविश्वास व स्थिरता
प्रदान करती है तथा सदैव उसे मानसिक बल प्रदान
करती हुई उन्नति की ओर अग्रसर
करती है। यह हमेशा साधक के साथ रहकर हर
कदम पर उसका हौसला बढ़ाती है। श्यामवर्णा, सुंदर
नेत्र और सदा प्रसन्नचित्र करने वाली यह
यक्षिणी अत्यक्षिक सुंदर देह वाली
मानी गई है।
7. नटी यक्षिणी : यह
यक्षिणी अपने साधक की पूर्ण रूप से
सुरक्षा करती है तथा किसी
भी प्रकार की विपरीत
परिस्थितियों में साधक को सरलता पूर्वक निष्कलंक
बचाती है। यह सभी तरह
की घटना-दुर्घटना से भी साधक को
सुरक्षित बचा ले आती है। उल्लेखनीय
है कि नटी यक्षिणी को विश्वामित्र ने
भी सिद्ध किया था।
8. अनुरागिणी यक्षिणी : यह
यक्षिणी यदि साधक पर प्रसंन्न हो जाए तो वह उसे
नित्य धन, मान, यश आदि से परिपूर्ण तृप्त कर देती
है। अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है
और यह साधक की इच्छा होने पर उसके साथ रास-
उल्लास भी करती है।
0.मूल अष्ट यक्षिणी मंत्र :॥ ॐ ऐं
श्रीं अष्ट यक्षिणी सिद्धिं सिद्धिं देहि
नमः॥ 1.सुर सुन्दरी मंत्र : ॥ ॐ ऐं
ह्रीं आगच्छ सुर सुन्दरी स्वाहा ॥
2.मनोहारिणी मंत्र :॥ ॐ ह्रीं
आगच्छ मनोहारी स्वाहा ॥ 3.कनकावती
मंत्र : ॐ ह्रीं हूं रक्ष कर्मणि आगच्छ
कनकावती स्वाहा ॥ 4.कामेश्वरी मंत्र :
ॐ क्रीं कामेश्वरी वश्य प्रियाय
क्रीं ॐ ॥ 5.रति प्रिया मंत्र : ॐ
ह्रीं आगच्छ आगच्छ रति प्रिया स्वाहा ॥
6.पद्मिनी मंत्र : ॐ ह्रीं
आगच्छ आगच्छ पद्मिनी स्वाहा ॥
7.नटी मंत्र : ॐ ह्रीं आगच्छ
आगच्छ नटी स्वाहा ॥ 8.अनुरागिणी
मंत्र : ॐ ह्रीं अनुरागिणी
आगच्छ स्वाहा ॥ अंत में उक्त मंत्रों के साथ अष्ट
यक्षिणी की साधना कैसे करें- यह
किसी योग्य जानकार से पूछकर करें।
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